Friday, 4 July 2014

प्रतीक्षा....!!

तुम अक्सर भेज देते हो
एक आश्वासन
अपनी छद्म मुस्कान में लपेट कर
जाने कितनी तहों में रखा गया जीवन
झलक कर खो जाता है
जीवन के हर विलोम का अर्थ ढू्ँढ रहे हो तुम
अँधेरा,दुःख,खोना,विरह,तड़प,पीर,व्यथा
सब व्यक्त हैं ,बस कथाएँ लुप्त हैं
उस विपरीत का आकर्षण ले जा रहा तुम्हें
दूर बहुत दूर जीवन की जीवटता से
हारा हुआ पथिक उल्टे पाँव ही चलता है
बुद्ध ने तो जीवन दर्शन ढू्ँढा
ज्ञान प्राप्त किया.....
उसी पथ का अनुसरण तुम भिी कर रहे
मेरी प्रार्थनाएँ उस पथ को आलोकित करेंगी
तुम आना प्रश्नों का उत्तर लेकर
इस सभ्य मानवता के आवरण को चीर कर
उस असभ्य जगत में लौटकर
जब आवरण की आवस्कता नहीं थिी सभ्यता को
शब्द का मोहताज नहीं था संप्रेषण
प्रेम मात्र प्रेम था
रीति रिवाज,परंपरा,रुढियों से मुक्त
प्रतिष्ठा और सामाजिक बन्धन से मुक्त
आदिम युग में.....
मैं प्रतीक्षा का दीपक जलाए रहूँगी
जो देहरी सूरज में छुप जाए
और रात के अँधेरे में जगमग हो
वही मेरा घर होगा...!!


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